सोमवार, 4 मई 2020

डॉ. अनंत भटनागर की कविताएँ


डॉ. अनंत भटनागर की कविताएँ

सपनो की चादर समेट

सपनो की चादर समेट
बांधे सिर पर
चिन्ताओ की
गठरी भारी
लौट रहे हैं वो पांव
पंख बनने को जो
छोड़ चले थे
अपने गांव !

आंखों में सूनापन
अंगुली पर झरते
बच्चों के आंसू
पत्नी की पगतालियो में
छलनी जीवन की
खुशियां सारी
लौट रहे हैं वो पाँव
सुख रचने को जो
छोड़ चले थे
अपने गांव !

कब मिलेगी
दिहाड़ी बकाया
कब चुकेगा
ब्याज सवाया
प्रश्नों के घेरे में कितनी शेष
बापू की उधारी
लौट रहे हैं वो पाँव
कुछ बनने को जो
छोड़ चले थे
अपने गांव !
*****

लॉकडाउन

हवाओं ने
जी भर ली है
खुली साँस
#
झील उदास
खोज रही
सखियाँ
#
प्रार्थनाएँ
अब हुई है
दिव्य
#
दिन
सीख रहा है
रात का सलीका
#
ऐश्वर्य सभी
कराह रहे
काराओं में
#
क्रूरताएं स्थगित
षडयंत्रो ने डाले
हथियार
#
यात्राएं जारी हैं
बाहर से भीतर
की ओर

*****

तुम्हारे कारण

चौक पर आई थी
कल शाम
खाना बांटने गाड़ी
पहुँचा जब तक
सब रीत गया था

अधजगे गुजरी रात
भूख के साथ
गलबहियां करते
सुबह से दुपहरी तक
गटक चुका
सौ बार पानी

घर की आ रही याद
फ़ोन आया था माँ का अभी
पूछा- "खाना खा लिया"
"हाँ" बोल दिया
पारबती की आवाज़ लगी
परबत सी भारी
मुनिया की फूट पड़ी रुलाई -
"कब आओगे? कब आओगे?"
मुन्ने की पल भर ही सुन पाया
किलकारी
और कनेक्शन
टूट गया

कई कई बार
संभाल चुका हूँ
मुनिया की फूलों वाली फ्रॉक
मुन्ने के नए खिलौने
सीतला के मेले से लाया था जिन्हें
साबुत हैं सभी अधिकतर
बस एक घर था जिसमें
चाबी भरने से गूंजता था संगीत
वही टूट गया
उस रात जब
घर जाने के लिए
बस स्टैंड पर मच गयी थी
भगदड़

दूसरी गली में हो रही
कुछ हलचल
देखूं शायद आया होगा
सूखा राशन

"चल, अंदर चल, स्साले"
पुलिस ने चटकाया डंडा
- "तुम्हारे कारण
फ़ैल रही बीमारी"
- "तुम्हारे कारण हम
घर जा नहीं पा रहे"

पीठ को सहलाते हुए
कई कई बार मैं भी
बुदबुदा चुका हूँ
-"तुम्हारे कारण
हम घर जा नहीं पा रहे"

*****

एक मदारी चार जमूरे

एक मदारी
चार जमूरे
जन गण सब
बजाओ मंजीरे

एक ने पहनी
सूट और टाई
चेहरा जैसे
अंग्रेज जमाई
सुन मदारी की आवाज
दौड़ा चला आता
काली कलमो से
कागज़ रंगता जाता

दूजे ने पहनी
सिर पे सफ़ेद टोपी
आँखें लोमड़ जैसी
कोयल जैसी बोली
देख मदारी के इशारे
अंग अंग मटकाता
भाषण के नाटक रच
गच्चा देता जाता

तीजे ने पहना
लम्बा काला चोगा
आँखों पे पट्टी,करता
शवासन में योगा
पढ़ मदारी के मन को
तराजू इधर उधर झुकाता
लकड़ी के बाटों को
लोहे सम बतलाता

चौथे ने टांगा
गले में बड़ा भोंपू
पहने मोटा चश्मा
लगता पक्का घोंचू
मदारी की इच्छा से
चिल्ल पों खूब मचाता
मरा मरा लिखकर
राम राम जतलाता

एक मदारी
चार जमूरे
चारों के चार
इंसान अधूरे
लोकतंत्र के खम्बे बन
खेल नए दिखलाते
रचते कई स्वांग
आहों को राग बतलाते
कहकर गम को
किस्मत की लकीरें

एक मदारी
चार जमूरे
जन गण सब
बजाओ मंजीरे

*****

विरह

झील स्तब्ध
व्याकुल / ताक रही
तट पर नाव
स्थिर

कौंध रहे
स्पर्श / स्मृति में
पतवारों के पाश
चपल

हठी तो तुम नहीं
किस छलना ने
कर लिया है
वशीकरण ?

###

चुपचाप लेटी है
पार्क में बैंच
बेचैन

साँसों की उमग
देह की भाषा
हँसी की लय
सबने छोड़ दिया
साथ

प्रेमी मेरे
सब निष्ठुर निकले !

###

सुलग रही सिगड़ी
अंगार ही अंगार
दहक रहे

पकाना नहीं था
कुछ
तो क्यों जगाई
आग?

###

ह्रदय में उग आये
ना जाने कितने
कैक्टस

बिछोह
उफ़! यह तेरा
तीखापन

जो कुछ हरा है
वही / हर रहा
पीड़ा

###

प्रतीक्षा तट पर
अधीर / मन
मछुआरा

नेत्र जल में
बनती / मिटती
छवि प्रिय की

यह बन्धन विकट
मुझ पर ही डाला
जाल?

- डॉ. अनन्त भटनागर



डॉ. अनंत भटनागर - जन्म - 09-09-1967, शिक्षा - एम.ए., पी.एच.डी, अजमेर के विजयसिंह पथिक श्रमजीवी महाविद्यालय के प्राचार्य, टर्निंग पॉइंट स्कूल के निदेशक, जनता के सरोकारों से जुड़े लेखक, साहित्यकार और शिक्षाविद, दूरदर्शन और आकाशवाणी से प्रसारित कवि-लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सार्थक पहचान। राधाकृष्ण प्रकाशन से 2017 में प्रकाशित 'वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ साहित्य जगत में बहुत चर्चित रही। दस से अधिक पुस्तकों के लेखक डॉ. भटनागर के लेख, आलोचना, कविता, व्यंग्य देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में निरंतर प्रकाशित होते हैं। मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के राज्य महासचिव और स्पिक मैके के जिला संयोजक।
ईमेल - anant_bhatnagar@yahoo.com, निवास - अजमेर।

गार्गी शर्मा की कविता


गार्गी शर्मा की कविता

शपथ

कैसी ये कोरोना महामारी।
करता जग यह त्राहि-त्राहि।।

आया विश्व पे संकट भारी।
भोग रही दुनिया यह सारी।।

धोलो हाथ सब बारी-बारी।
मुखौटा बना है लाचारी।।

रहो निलय, न खोलो किवाड़ी ।
जिनको अपनी जान है प्यारी।।

कैसी होली, अब कैसी दिवाली।
जलाओ दीप, बजाओ थाली।।

नीति पे हो रही जनता भारी।
कैसी ये जमात, सल्तनत क्यूँ हारी?

इस समर बीच खड़ी मैं नारी।
सोच रही अब किसकी बारी।।

हुआ अंधेरा अब विपदा भारी।
काहे पथ भूले 'गिरधारी।।

करो नाश बजाओ रणभेरी।
दे रहे 'शपथ' अब कर ना देरी।।

- गार्गी शर्मा



गार्गी शर्मा - जन्मतिथि 24-6-1981, शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), बी.एड., पूर्व में संत जोसेफ सीनियर सेकेंडरी स्कूल परबतपुरा और आदर्श विद्या निकेतन में हिंदी अध्यापिका। निवास - अजमेर। समय समय पर हिंदी व गुजराती मंत कविताओं और लघुकथाओं की रचना। अपनी रचनाओं के माध्यम से भावाभिव्यक्ति के लिए हमेशा प्रयत्नशील एक गृहिणी।

रविवार, 3 मई 2020

डॉ. मंजु सिंह 'मरालिका' की कविताएँ


डॉ. मंजु सिंह 'मरालिका' की कविताएँ

हे प्रलयंकर !

हे प्रलयंकर ! फिर एक बार विषपान करो,
मानवता की रक्षा हित कोरोना संधान करो।

हर शहर गांव गलियां और चौबारे,
सब सूने और सहमे सहमे दीख रहे।
घर में कई दिनों से कैद हुए बच्चे,
बाहर जाने दो कहकर चीख रहे।
भूलन ने चौके में जाकर देखा तो,
बस दो टाइम का ही राशन है।
सोच रहा है आगे का कैसे करे जुगाड़।
ऐसे लाचारों की खातिर कोरोना पर वार करो !

हे प्रलयंकर ! फिर एक बार विषपान करो,
मानवता की रक्षा हित कोरोना संधान करो !

घर की दहलीजों के अंदर रहकर ,
मानवता के स्वास्थ्य और सुरक्षा हित।
कैसे भी हम टाल सकें यह मुश्किल,
इस हेतु दवा, दुआ, दिशा और उपचार ढूंढ़ते।
एकाग्रचित्त हो प्रभु तव चरणों में ध्यान लगा।
सारे देश को निगल जाने की नीयत से ,
कोरोना रूपी संकट है सुरसा सा मुंह फैलाए।
प्रभु खोल तीसरा नेत्र इसे अब भस्म करो !

हे प्रलयंकर ! फिर एक बार विषपान करो,
मानवता की रक्षा हित कोरोना संहार करो !

चीन ने मदांध हो जी भर मनमानी की,
ईर्ष्या द्वेष के कुत्सित भावों से प्रेरित हो।
गलित कृत्य कर मूर्खों सी नादानी की,
उसके कारण मानवता संकट ग्रस्त हुई।
खुशहाल जिंदगी पर कोरोना काल बन मंडराता,
इस अप्रत्याशित संकट से सब रहे कराह।
सजल नयन हो मन ही मन भरते आह,
व्यथित जनों के उर में उम्मीदों की किरण भरो !

हे प्रलयंकर ! फिर एक बार विषपान करो,
मानवता की रक्षा हित कोरोना संहार करो !
*****
खुशियों की उजली सुबह

हे ! भारत मां के सपूतों
माना कि तुमने युद्ध के मैदान में
निडर भाव से
प्राणों को हथेली पर रख
लड़े हैं अनेकों युद्ध
हर बार धर्म विजयी रहा
त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने
अधर्मी रावण को धूल चटाई थी
उनके सेवक हनुमान ने
सोने की लंका खाक में मिलायी थी
याद करो !
महाभारत का वह कठिन युद्ध
जब कुरुक्षेत्र के मैदान में
धर्म पथ के पथी पांडवों ने
धूर्त कौरवों को किया था पराजित
पुनः धर्म हुआ था प्रतिष्ठित
इसी तरह श्री कृष्ण ने
अत्याचारी कंस और शिशुपाल का
किया था वध
क्योंकि उन्होंने पार कर दी थी
गलतियों की हद
हर विजय के साथ
धर्म गर्व से मुस्कुराया था
अधर्म ने शर्म से सिर झुकाया था
स्थितियां अलग हैं
आज का यह युद्ध
धर्म और अधर्म
अत्याचारी और सदाचारी
वैचारिक - वैभिन्य
अपने- पराए
अधिकार और कर्तव्य
शोषक और शोषित के बीच का नहीं
यह युद्ध जीवन और मृत्यु के बीच है
जो खुले मैदान में
अस्त्र शस्त्रों से नहीं
घरों के अंदर छिपकर शांति, बुद्धि कौशल,
स्वच्छता, जागरूकता और एक दूसरे से
दूरी बनाकर लड़ना है
मुझे विश्वास है कि जिस तरह
सतत प्रयास से सावित्री
अपने पति सत्यवान को यमद्वार से
वापस लौटा लाई थी
उसी तरह तुम भी
देश के मुखिया द्वारा निर्देशित
लक्ष्मण- रेखा के अंदर रहकर
मानवता पर मौत के रूप में मंडरा रहे
इस विषैले वाइरस को हराओगे
अटल विश्वास, समझदारी और जिजीविषा से
दुख, सन्नाटे और खौफ के मंजर को चीरकर
आने वाली खुशियों की
उजली सुबह देख पाओगे
गर्व से विजयोत्सव मनाओगे !
*****
कोरोना

सूखी खांसी तेज ज्वर, औे रुकती हो सांस।
बिना बिलंब के जाइए, कुशल डॉक्टर पास।।1
कोरोना के कहर से, परेशान सब लोग।
दुनियां के हर देश में, फ़ैल रहा यह रोग।।2
गलती सारी चीन की, भुगत रहे सब देश।
कोरोना की मार से, मुक्त करो देवेश।।3
कोरोना का वायरस, बना गले की फांस।
शाकाहारी है सही, त्यागो मछली मांस।4
आंखों में आंसू भरे, विश्व देखता राह।।
कोरोना को भगा दो, प्रभु इतनी सी चाह।।5
कोरोना से मुक्ति हित , कर करबद्ध प्रणाम।
स्वच्छता से होगा सदा, इसका काम तमाम ।6
हर मानव भयभीत सा, करता करुण पुकार।
कोरोना संहार हित, प्रभु फिर लो अवतार।।7
ठंडा भोजन मत करो, करो गरारा रोज़।
जल्दी ही हो जाएगी, टीके की भी खोज।।8
बीमारी से मत डरो, करो उचित उपचार।।
बचाव की तरकीब का, जमकर करो प्रचार।।9
संकट में है विश्व अब, उड़ी हुई है नींद।
कोरोना कैसे भगे, तलाश रहा उम्मीद।।10
कूड़ा कचरा फेंक दो, साफ़ रखो घर द्वार।
कोरोना के कहर से, तब पाओगे पार ।।11
रहो भीड़ से दूर तुम, हरदम पहनो मास्क।
कोरोना को भगाकर,कर दो पूरा टास्क।।12
आंख नाक मुंह ना छुएं, धुलें सदा ही हाथ।
अग्रज जन के सामने, झुका लीजिए माथ।।13
वस्त्र सुखाएं धूप में, पिएं न ठंडा नीर।
कोरोना डरकर भगे, होवे स्वस्थ शरीर।।14
कोरोना ने कर दिया, बुरा विश्व का हाल।
कुछ ऐसा कर दो प्रभु, सब होवें खुशहाल।।15
*****
तुम विजय अवश्य ही पाओगे ।

तुम विजय अवश्य ही पाओगे ।
मानवता को खुशहाल बनाओगे।।
हे भारत मां के सजग पहरुओं,
मत रुकना, मत थकना,भीत न होना।
इस मुश्किल क्षण में मत धीरज खोना।
स्थितियों के अनुरूप प्रयत्न कर,
निश्चय ही वांछित लक्ष्य पा जाओगे।
तुम विजय अवश्य ही पाओगे।
मानवता को खुशहाल बनाओगे।।
मानवता पर विषधर सा मंडराता,
यह संकट अवश्य ही टल जाएगा।
उम्मीदों का दिनकर खुश हो मुस्काएगा।
सामर्थ्य और समझदारी के संयोजन से,
संक्रमण रूप सुरसा को अवश्य हराओगे।
तुम विजय अवश्य ही पाओगे।
मानवता को खुशहाल बनाओगे।।
राष्ट्र- सुरक्षा हित मोदी जी के महायज्ञ में,
आओ हम सब मिलकर आहुति डालें ।
एकजुट हो प्राणों पर मंडराता संकट टालें।
ले हृदय विजय विश्वास बढ़ो लक्ष्य की ओर,
भारत के माथे पर तुम चंदन तिलक लगाओगे।
तुम विजय अवश्य ही पाओगे।
मानवता को खुशहाल बनाओगे।।
*****
कोरोना का कर दो संहार नाथ ।।

कर दो जग पर उपकार नाथ।
कोरोना का कर दो संहार नाथ ।।
जग पर आई इस विपदा को,
निज संधानों से टालो प्रभु।
इस महा विषैले कीड़े का,
संहार तुरत कर डालो प्रभु।
अखिल विश्व किंकर्तव्यविमूढ़ सा,
करता है करुण पुकार नाथ।
कर दो जग पर उपकार नाथ।
कोरोना का कर दो संहार नाथ।।
भारत मां निज संतानों का दुख लख,
सिसक सिसक कर रोती है।
दशों दिशाएं यह दृश्य देख,
हो व्याकुल धीरज खोती हैं।
प्रभु तुमने हर संकट की बेला में,
निज भक्तों का किया उद्धार नाथ।
कर दो जग पर उपकार नाथ।
कोरोना का कर दो संहार नाथ।।
माना कि मानव जाति ने मनमानी की,
स्वार्थ हेतु पर्यावरण को दिया कष्ट।
निरंतर आघातों से आहत प्रकृति,
आज विश्व से हो गई रूष्ट।
गलती के प्रति नतमस्तक जग को,
दे दो निरोगी होने का उपहार नाथ।
कर दो जग पर उपकार नाथ।
कोरोना का कर दो संहार नाथ।।
हम भारतवासी संकल्प उठाते,
बात राष्ट्र मुखिया की हम मानेंगे।
इक्कीस दिनों तक निर्देशित
लक्ष्मण रेखा को ना लाघेंगे ।
दे दो संबल निज कृपा दृष्टि का,
इस विषाणु पर पा जाएं विजय नाथ।
कर दो जग पर उपकार नाथ।
कोरोना का कर दो संहार नाथ।।

- डॉ. मंजु सिंह 'मरालिका'



डॉ. मंजु सिंह 'मरालिका' - जन्म-तिथि - 02-03-1976, शिक्षा - एम. ए. (हिन्दी, संस्कृत), बी. एड., नेट, पी. एच. डी., पुरस्कार - बीस से अधिक समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित सृजन हेतु सम्मान पत्र और पुरस्कार प्राप्त, प्रकाशित पुस्तकें - साहित्य की अनमोल धरोहर, 150 काव्य के अनमोल सितारे (सांझा संग्रह), आईआईटी कानपुर के वार्षिक कार्यक्रम अंतराग्नि के हिंदी इवेंट में निर्णायक की भूमिका भी निभाई, वर्तमान में श्री देशराज नारंग दयानंद इंटर कॉलेज, वाल्टर गंज (जिला- बस्ती, उत्तर प्रदेश) में शिक्षिका।

शनिवार, 2 मई 2020

राजश्री गोस्वामी की कविताएँ


राजश्री गोस्वामी की कविताएँ

कोरोना के लिए अभिव्यक्ति
एक अच्छी, साधारण एवं सरल सोच - हम सभी के लिए

--------
1.
देश, समाज और अपनी रक्षा के लिए,
घर पर ही रहकर काम करो,
प्रभात में प्रभु का नाम लेकर,
घर की साफ़-सफाई, स्नान करो,
पूजा अर्चन वंदन करो,
पठन पाठन, नई योजना, बालकों की पढ़ाई देखभाल करो !

आराम से नए विचारों को व्यक्त करो,
हम सभी की भलाई के लिए इतना अवश्य करो,
इस कोरोना के कहर का अंत करो, अंत करो, अंत करो !
(24/3/2020)
--------
2.
कोरोना प्रकोप ने माँ धरती को विचलित कर दिया,
सभी को घर में रहने का आदेश दिया,
शोरगुल हलचल से दुनिया व्याकुल हुई,
इसी कारण लॉक डाउन का सन्देश दिया !
(26/3/2020)
--------
3.
समय अभी कठिन है,
संयम संकल्प की जरुरत है,
करना नहीं है पलायन,
यहीं होगी व्यवस्था अन्न धन,
कहीं जाने से न मिलेगा समाधान,
घर पर ही रहकर करें विधान !
(29/3/2020)
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4.
आस्था का दीपक

रात के दीपोत्सव ने हर घर को
दीपावली का आभास दिया !
तन-मन को उल्लसित कर दिया,
मन में एक नयी ऊर्जा का उदय हुआ !
एक आशा और विश्वास हुआ,
इस कैरोना के भय का जैसे नाश हुआ !
हर दीये ने शुभ सन्देश दिया,
संगम साधना का पाठ दिया !
सेवाकर्मी जो रात-दिन तत्पर हैं,
रहें सुखी यह आशीर्वाद दिया !
(6/4/2020)
--------
- राजश्री गोस्वामी
(एक माँ, नानी और दादी)


राजश्री गोस्वामी - जन्म जयपुर के एक मध्यमवर्गीय धार्मिक - सांस्कृतिक सरल ब्राह्मण परिवार में। पिता आचार्य - पुजारी - शिक्षक। दो पुत्र और दो पुत्रियॉं - सभी का सुव्यवस्थित जीवन। शिक्षा - स्नातक। सामयिक परिस्थितियों में लेखन पुनः सक्रिय। वैश्विक महामारी से उत्पन्न लॉकडाउन ने तन से गृह-बद्ध अवश्य किया, पर मन की उन्मुक्तता हर रोज लघु काव्य के रूप में प्रकट होने लगी है। पतिदेव बृजेन्द्र गोस्वामी के साहचर्य, सहयोग एवं प्रेरणा से युक्त तुष्ट-संतुष्ट-परिपुष्ट व्यक्तित्व और वरिष्ठ नागरिक। जयपुर में निवास।

डॉ. महिमा श्रीवास्तव की कविताऍं


डॉ. महिमा श्रीवास्तव की कविताऍं

आखिर क्यूँ भला

जिंदगी बेमजा फीकी ही रह जाएगी
लॉकडाउन में ब्लॉक क्यूँ करते भला !

नगमों के बोल दीवारों से जा टकरायेंगे
साज एक मीटर से दूर क्यूँ रखते भला !

गुरुर हथेलियों पर ही जमा रह जाएगा
धुलवाने खड़े दीवाने से बचते क्यूँ भला !

बारिश से पिघल के बह तो ना जाओगे
छत पर जा भीगने से ही डरते क्यूँ भला !

फकीरी चुन ही ली है कोरोना को देख के
हंसी बांटने से फिर कतराते क्यूँ भला !

कलम के कारीगर जो कहलाते थे कभी
स्याही खरचने से तो अब डरते क्यूँ भला !


फिर मिलेंगे

फिर मिलेंगे, आउटब्रेक के बाद
जब तुम्हारा चाँद सा चेहरा
मास्क से ना ढका होगा !

उसके ऊपर से झांकते तुम्हारे
मृगनैन ना सहमें होंगे आतंक से
जा बैठेंगे किसी पार्क में
जहां फिर से घूमने लगे होंगे जोड़े
दिए हाथों में हाथ !

या फिर जा बैठेंगे उस रेस्त्रां में
जहां कॉफी के साथ फिर से
होने लगी होगी हम जैसों की
आँखों ही आँखों में बात !

या फिर ले जाऊंगा तुम्हे उस
खचाखच भीड़ भरे मॉल
जहां सेल ढूंढती तुम खुशी से
थाम लोगी एकाएक मेरी बांह !

हाँ, यह सब हम अवश्य करेंगे
इससे पहले देनी है करोना को
कड़ी सी चुनौती और करारी हार
फिर मिलेंगे हम दहशतों के पार !!

- डॉ. महिमा श्रीवास्तव



डॉ. महिमा श्रीवास्तव - संगीत, अभिनय, आकृति चित्रकारी, नृत्य, लेखन, सैर, चित्रकारी, रेखांकन, कला, नाटक, कविता, रचनात्मक लेखन , पठन आदि में रुचि रखना। शिक्षा - एमबीबीएस, एमएस (Gynae Obs), एमएस (एनाटॉमी), वर्तमान में - मेडिकल कॉलेज, अजमेर में स्त्री रोग विशेषज्ञ और वरिष्ठ प्रोफेसर। प्रमुख पत्रिकाओं जैसे रीडर डाइजेस्ट, कादिम्बिनी, मेरी सहेली, वनिता और अखबारों में कई कविताएँ और लेख प्रकाशित।

केशव राम सिंघल की कुछ कविताऍं


केशव राम सिंघल की कुछ कविताऍं

लाओ शान्ति का नया सन्देश !
दूर करो नाभकीय, रासायनिक, जीवाणु महाविनाश !!


1.
विचार बीज थे
वे उन्हें समाप्त नहीं कर पाए
मष्तिष्क की धुलाई
प्रतिबद्धता की कसमें
साम, दाम, दंड और भेद से !
2.
विचार से आंदोलन पनपे
वे उसे समाप्त नहीं कर पाए
वही घने वृक्ष बन गए
उखाड़ फेंकने की बहुत कोशिश की
जड़ से, मूल से !
3.
समाजवाद, राष्ट्रवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद
बहुत कुछ पनपा
भौतिक उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा
नहीं सीखा हमने संतुलन बनाना
शस्त्रास्त्रों की होड़ से, दौड़ से !
4.
काल का प्रवाह अनंत है, निर्बाध है
जीवन भी अनंत है, निर्बाध है
पर हर जीवन, हर पल उत्सव नहीं
सूक्ष्म जीवाणु भी है खतरनाक
बचते रहो उसके स्पर्श से !
5.
चमत्कार की आशा भोलापन है
लोग डर रहे हैं
प्रलय की प्रतीक्षा
मस्तिष्क में नकारात्मकता
ख़त्म होगी सकारात्मकता से !
6.
अभी ही समय है
प्रकृति पर विजयी ख़्वाब छोड़ दो
जीवन को प्रकृति से जोड़ दो
दूर करो आपसी होड़
बचो पर्यावरण-खतरों से !
7.
लाओ शान्ति का नया सन्देश
दूर करो नाभकीय, रासायनिक, जीवाणु महाविनाश
खतरों और अंतर्विरोधों से दबा संसार
बदलेगा विवेक और नैतिकता से
सोचने के नए ढंग से !

लाओ शान्ति का नया सन्देश !
दूर करो नाभकीय, रासायनिक, जीवाणु महाविनाश !!

*****

दुःखद अवसाद की कविता -
तासीर कुछ विषाणु की और कुछ व्यवस्था की ...


१।
जैसे-तैसे कुछ जीएंगे -
भूख में
बेरोजगारी में
नफ़रत में
अवसाद में
बगैर इलाज में
कर्ज में
पुराने मर्ज में
कोरोना विषाणु दर्द में !

२।
कुछ मरेंगे -
भूख से
बेरोजगारी से
नफ़रत से
अवसाद से
बगैर इलाज से
कर्ज से
पुराने मर्ज से
कोरोना विषाणु दर्द से !

३।
वह प्रवासी मजदूर था
इसलिए ही हालत से मजबूर था
रेल - बस सब बंद
इसलिए पैदल ही निकल पड़ा घर-गाँव के लिए
नहीं मिला उसे रास्ते में खाना
क्योंकि उसके हिस्से में थी मौत को पाना !

*****

श्रम की महत्ता और परेशान प्रवासी श्रमिक

कोरोना वायरस संक्रमण - एक ऐसी मानवीय त्रासदी, जिसका सबसे अधिक असर गरीब तबके पर पड़ा। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के लगाने के बाद 24 मार्च को शाम आठ बजे महज चार घंटे के नोटिस पर बिना किसी तैयारी के इक्कीस दिनों का लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। करोड़ों लोगों पर अचानक आया बेरोजगारी का संकट, रहने और खाने की किल्लत। घर से दूर अनहोनी की आशंका ने हजारों-लाखों प्रवासी श्रमिकों को घर-गाँव वापसी के लिए किया मजबूर। यातायात का साधन नहीं, इसलिए हजारों किलोमीटर दूर अपने घर-गाँव पैदल चले प्रवासी श्रमिक मजदूर।

सम्बंधित कुछ पंक्तियाँ -
----------
1.
श्रम की महत्ता


जीवन में श्रम जरूरी,
श्रम के बिना कुछ भी नहीं !

हर दिन होता बहुत श्रम,
किसान खेतों में,
मजदूर कल-कारखानों में,
हर जगह दिखता है श्रम !

बिना श्रम कर्म नहीं,
जीवन का सुख श्रम से,
जीवन में श्रम जरूरी,
श्रम के बिना कुछ भी नहीं !
----------
2.
परेशान प्रवासी श्रमिक


अचानक आया बेरोजगारी का संकट,
रहने और खाने की किल्लत,
अनहोनी की आशंका,
इन सबने किया -
घर-गाँव वापसी के लिए मजबूर,
नहीं यातायात का कोई साधन,
पैदल ही चले प्रवासी श्रमिक-मजदूर।

तालाबंदी के दौर में,
प्रवासी श्रमिक अधिक परेशान,
रहता अपने घर-गाँव दे दूर,
सभी गए उसे भूल !

*****

दया के पात्र हैं

दया के पात्र हैं संक्रमण के हैं जो शिकार,
और वे भी जिनके मन में है कोई विकार,
आओ शुद्धि की करें कोशिश, प्रचार-प्रसार,
ताकि ना हों हम किसी दुर्गति के शिकार !
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लॉकडाउन के दौरान
############
खुद की कैद में रहते
मैंने सुना
चिड़ियों का चहकना,
कबूतरों की गुटर गूं !
खुद की कैद में रहते
मैंने देखा
पक्षियों का फुदकना, उन्मुक्त उड़ना,
फूलों का खिलना,
मोरों का नाचना,
नील गायों का सरपट दौड़ना !
खुद की कैद में रहते
मैंने महसूस किया
हवा में ताजगी,
वातावरण में शांति,
अपने में स्फूर्ति !
********

- केशव राम सिंघल




केशव राम सिंघल - एक बहुमुखी व्यक्तित्व, जो मानवता के लिए काम करता है, विभिन्न क्षेत्रों जैसे गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली, क्यूएमएस ऑडिट, प्रकाशन, संपादन, प्रशिक्षण आदि में ज्ञान और बैंकिंग में लगभग पच्चीस वर्षों का अनुभव। एक तेजी से सीखने वाला, नई और उभरती अवधारणाओं के लिए हमेशा तत्पर रहता है, जिम्मेदारियों को संभालने की क्षमता और योग्यता रखता है। अपने व्यक्तिगत प्रयासों से समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव लाने के लिए विभिन्न सामाजिक और व्यावसायिक संगठनों के साथ जुड़ा हुआ है। एक आशावादी, सामाजिक और निवर्तमान व्यक्ति, अच्छा श्रोता और समर्पित कार्यकर्ता। इस ब्लॉग का प्रवर्तक।


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गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

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प्रिय पाठकों,

नमस्कार !

तालाबंदी (अर्थात 'लॉकडाउन') के दौरान अनेक कविताओं का सृजन हो रहा है। कविता एक ऐसी विधा है, जो हमें आनंदित व स्पंदित करने, नए स्वप्न व नए क्षितिज की ओर प्रेरित करने के साथ-साथ बहुत कुछ सम्प्रेषित कर जाती है। यह विभिन्न मानवीय अनुभूतियों, संवेदनाओं, सहमति, समर्थन से सृजित होती है। कहीं मैंने पढ़ा - कविता भी एक सुन्दर चिड़िया ही है। ..... व्यक्ति के मुख में कविता कल्लोल करती है। ..... वह एकांत में सृजित होती है। तालाबंदी (अर्थात 'लॉकडाउन') के दौरान लिखी कुछ चुनिंदा कविताओं को फेसबुक ग्रुप 'तालाबंदी के दौरान की कविता - कवि और पाठक समूह' में साझा किया गया। इन कविताओं को विश्वव्यापी पाठक पढ़ सके और साथ ही कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद का टूल भी सुलभ हो सके, इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस ब्लॉग को प्रारम्भ किया गया है।

आशा है आपको यह ब्लॉग रुचिकर लगेगा। आपके सुझाव और टिप्पणियों का स्वागत रहेगा।

केशव राम सिंघल