आखिर क्यूँ भला
जिंदगी बेमजा फीकी ही रह जाएगी
लॉकडाउन में ब्लॉक क्यूँ करते भला !
नगमों के बोल दीवारों से जा टकरायेंगे
साज एक मीटर से दूर क्यूँ रखते भला !
गुरुर हथेलियों पर ही जमा रह जाएगा
धुलवाने खड़े दीवाने से बचते क्यूँ भला !
बारिश से पिघल के बह तो ना जाओगे
छत पर जा भीगने से ही डरते क्यूँ भला !
फकीरी चुन ही ली है कोरोना को देख के
हंसी बांटने से फिर कतराते क्यूँ भला !
कलम के कारीगर जो कहलाते थे कभी
स्याही खरचने से तो अब डरते क्यूँ भला !
फिर मिलेंगे
फिर मिलेंगे, आउटब्रेक के बाद
जब तुम्हारा चाँद सा चेहरा
मास्क से ना ढका होगा !
उसके ऊपर से झांकते तुम्हारे
मृगनैन ना सहमें होंगे आतंक से
जा बैठेंगे किसी पार्क में
जहां फिर से घूमने लगे होंगे जोड़े
दिए हाथों में हाथ !
या फिर जा बैठेंगे उस रेस्त्रां में
जहां कॉफी के साथ फिर से
होने लगी होगी हम जैसों की
आँखों ही आँखों में बात !
या फिर ले जाऊंगा तुम्हे उस
खचाखच भीड़ भरे मॉल
जहां सेल ढूंढती तुम खुशी से
थाम लोगी एकाएक मेरी बांह !
हाँ, यह सब हम अवश्य करेंगे
इससे पहले देनी है करोना को
कड़ी सी चुनौती और करारी हार
फिर मिलेंगे हम दहशतों के पार !!
- डॉ. महिमा श्रीवास्तव

डॉ. महिमा श्रीवास्तव - संगीत, अभिनय, आकृति चित्रकारी, नृत्य, लेखन, सैर, चित्रकारी, रेखांकन, कला, नाटक, कविता, रचनात्मक लेखन , पठन आदि में रुचि रखना। शिक्षा - एमबीबीएस, एमएस (Gynae Obs), एमएस (एनाटॉमी), वर्तमान में - मेडिकल कॉलेज, अजमेर में स्त्री रोग विशेषज्ञ और वरिष्ठ प्रोफेसर। प्रमुख पत्रिकाओं जैसे रीडर डाइजेस्ट, कादिम्बिनी, मेरी सहेली, वनिता और अखबारों में कई कविताएँ और लेख प्रकाशित।
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