सपनो की चादर समेट
सपनो की चादर समेट
बांधे सिर पर
चिन्ताओ की
गठरी भारी
लौट रहे हैं वो पांव
पंख बनने को जो
छोड़ चले थे
अपने गांव !
आंखों में सूनापन
अंगुली पर झरते
बच्चों के आंसू
पत्नी की पगतालियो में
छलनी जीवन की
खुशियां सारी
लौट रहे हैं वो पाँव
सुख रचने को जो
छोड़ चले थे
अपने गांव !
कब मिलेगी
दिहाड़ी बकाया
कब चुकेगा
ब्याज सवाया
प्रश्नों के घेरे में कितनी शेष
बापू की उधारी
लौट रहे हैं वो पाँव
कुछ बनने को जो
छोड़ चले थे
अपने गांव !
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लॉकडाउन
हवाओं ने
जी भर ली है
खुली साँस
#
झील उदास
खोज रही
सखियाँ
#
प्रार्थनाएँ
अब हुई है
दिव्य
#
दिन
सीख रहा है
रात का सलीका
#
ऐश्वर्य सभी
कराह रहे
काराओं में
#
क्रूरताएं स्थगित
षडयंत्रो ने डाले
हथियार
#
यात्राएं जारी हैं
बाहर से भीतर
की ओर
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तुम्हारे कारण
चौक पर आई थी
कल शाम
खाना बांटने गाड़ी
पहुँचा जब तक
सब रीत गया था
अधजगे गुजरी रात
भूख के साथ
गलबहियां करते
सुबह से दुपहरी तक
गटक चुका
सौ बार पानी
घर की आ रही याद
फ़ोन आया था माँ का अभी
पूछा- "खाना खा लिया"
"हाँ" बोल दिया
पारबती की आवाज़ लगी
परबत सी भारी
मुनिया की फूट पड़ी रुलाई -
"कब आओगे? कब आओगे?"
मुन्ने की पल भर ही सुन पाया
किलकारी
और कनेक्शन
टूट गया
कई कई बार
संभाल चुका हूँ
मुनिया की फूलों वाली फ्रॉक
मुन्ने के नए खिलौने
सीतला के मेले से लाया था जिन्हें
साबुत हैं सभी अधिकतर
बस एक घर था जिसमें
चाबी भरने से गूंजता था संगीत
वही टूट गया
उस रात जब
घर जाने के लिए
बस स्टैंड पर मच गयी थी
भगदड़
दूसरी गली में हो रही
कुछ हलचल
देखूं शायद आया होगा
सूखा राशन
"चल, अंदर चल, स्साले"
पुलिस ने चटकाया डंडा
- "तुम्हारे कारण
फ़ैल रही बीमारी"
- "तुम्हारे कारण हम
घर जा नहीं पा रहे"
पीठ को सहलाते हुए
कई कई बार मैं भी
बुदबुदा चुका हूँ
-"तुम्हारे कारण
हम घर जा नहीं पा रहे"
*****
एक मदारी चार जमूरे
एक मदारी
चार जमूरे
जन गण सब
बजाओ मंजीरे
एक ने पहनी
सूट और टाई
चेहरा जैसे
अंग्रेज जमाई
सुन मदारी की आवाज
दौड़ा चला आता
काली कलमो से
कागज़ रंगता जाता
दूजे ने पहनी
सिर पे सफ़ेद टोपी
आँखें लोमड़ जैसी
कोयल जैसी बोली
देख मदारी के इशारे
अंग अंग मटकाता
भाषण के नाटक रच
गच्चा देता जाता
तीजे ने पहना
लम्बा काला चोगा
आँखों पे पट्टी,करता
शवासन में योगा
पढ़ मदारी के मन को
तराजू इधर उधर झुकाता
लकड़ी के बाटों को
लोहे सम बतलाता
चौथे ने टांगा
गले में बड़ा भोंपू
पहने मोटा चश्मा
लगता पक्का घोंचू
मदारी की इच्छा से
चिल्ल पों खूब मचाता
मरा मरा लिखकर
राम राम जतलाता
एक मदारी
चार जमूरे
चारों के चार
इंसान अधूरे
लोकतंत्र के खम्बे बन
खेल नए दिखलाते
रचते कई स्वांग
आहों को राग बतलाते
कहकर गम को
किस्मत की लकीरें
एक मदारी
चार जमूरे
जन गण सब
बजाओ मंजीरे
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विरह
झील स्तब्ध
व्याकुल / ताक रही
तट पर नाव
स्थिर
कौंध रहे
स्पर्श / स्मृति में
पतवारों के पाश
चपल
हठी तो तुम नहीं
किस छलना ने
कर लिया है
वशीकरण ?
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चुपचाप लेटी है
पार्क में बैंच
बेचैन
साँसों की उमग
देह की भाषा
हँसी की लय
सबने छोड़ दिया
साथ
प्रेमी मेरे
सब निष्ठुर निकले !
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सुलग रही सिगड़ी
अंगार ही अंगार
दहक रहे
पकाना नहीं था
कुछ
तो क्यों जगाई
आग?
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ह्रदय में उग आये
ना जाने कितने
कैक्टस
बिछोह
उफ़! यह तेरा
तीखापन
जो कुछ हरा है
वही / हर रहा
पीड़ा
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प्रतीक्षा तट पर
अधीर / मन
मछुआरा
नेत्र जल में
बनती / मिटती
छवि प्रिय की
यह बन्धन विकट
मुझ पर ही डाला
जाल?
- डॉ. अनन्त भटनागर

डॉ. अनंत भटनागर - जन्म - 09-09-1967, शिक्षा - एम.ए., पी.एच.डी, अजमेर के विजयसिंह पथिक श्रमजीवी महाविद्यालय के प्राचार्य, टर्निंग पॉइंट स्कूल के निदेशक, जनता के सरोकारों से जुड़े लेखक, साहित्यकार और शिक्षाविद, दूरदर्शन और आकाशवाणी से प्रसारित कवि-लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सार्थक पहचान। राधाकृष्ण प्रकाशन से 2017 में प्रकाशित 'वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ साहित्य जगत में बहुत चर्चित रही। दस से अधिक पुस्तकों के लेखक डॉ. भटनागर के लेख, आलोचना, कविता, व्यंग्य देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में निरंतर प्रकाशित होते हैं। मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के राज्य महासचिव और स्पिक मैके के जिला संयोजक।
ईमेल - anant_bhatnagar@yahoo.com, निवास - अजमेर।
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