लाओ शान्ति का नया सन्देश !
दूर करो नाभकीय, रासायनिक, जीवाणु महाविनाश !!
1.
विचार बीज थे
वे उन्हें समाप्त नहीं कर पाए
मष्तिष्क की धुलाई
प्रतिबद्धता की कसमें
साम, दाम, दंड और भेद से !
2.
विचार से आंदोलन पनपे
वे उसे समाप्त नहीं कर पाए
वही घने वृक्ष बन गए
उखाड़ फेंकने की बहुत कोशिश की
जड़ से, मूल से !
3.
समाजवाद, राष्ट्रवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद
बहुत कुछ पनपा
भौतिक उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा
नहीं सीखा हमने संतुलन बनाना
शस्त्रास्त्रों की होड़ से, दौड़ से !
4.
काल का प्रवाह अनंत है, निर्बाध है
जीवन भी अनंत है, निर्बाध है
पर हर जीवन, हर पल उत्सव नहीं
सूक्ष्म जीवाणु भी है खतरनाक
बचते रहो उसके स्पर्श से !
5.
चमत्कार की आशा भोलापन है
लोग डर रहे हैं
प्रलय की प्रतीक्षा
मस्तिष्क में नकारात्मकता
ख़त्म होगी सकारात्मकता से !
6.
अभी ही समय है
प्रकृति पर विजयी ख़्वाब छोड़ दो
जीवन को प्रकृति से जोड़ दो
दूर करो आपसी होड़
बचो पर्यावरण-खतरों से !
7.
लाओ शान्ति का नया सन्देश
दूर करो नाभकीय, रासायनिक, जीवाणु महाविनाश
खतरों और अंतर्विरोधों से दबा संसार
बदलेगा विवेक और नैतिकता से
सोचने के नए ढंग से !
लाओ शान्ति का नया सन्देश !
दूर करो नाभकीय, रासायनिक, जीवाणु महाविनाश !!
*****
दुःखद अवसाद की कविता -
तासीर कुछ विषाणु की और कुछ व्यवस्था की ...
१।
जैसे-तैसे कुछ जीएंगे -
भूख में
बेरोजगारी में
नफ़रत में
अवसाद में
बगैर इलाज में
कर्ज में
पुराने मर्ज में
कोरोना विषाणु दर्द में !
२।
कुछ मरेंगे -
भूख से
बेरोजगारी से
नफ़रत से
अवसाद से
बगैर इलाज से
कर्ज से
पुराने मर्ज से
कोरोना विषाणु दर्द से !
३।
वह प्रवासी मजदूर था
इसलिए ही हालत से मजबूर था
रेल - बस सब बंद
इसलिए पैदल ही निकल पड़ा घर-गाँव के लिए
नहीं मिला उसे रास्ते में खाना
क्योंकि उसके हिस्से में थी मौत को पाना !
*****
श्रम की महत्ता और परेशान प्रवासी श्रमिक
कोरोना वायरस संक्रमण - एक ऐसी मानवीय त्रासदी, जिसका सबसे अधिक असर गरीब तबके पर पड़ा। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के लगाने के बाद 24 मार्च को शाम आठ बजे महज चार घंटे के नोटिस पर बिना किसी तैयारी के इक्कीस दिनों का लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। करोड़ों लोगों पर अचानक आया बेरोजगारी का संकट, रहने और खाने की किल्लत। घर से दूर अनहोनी की आशंका ने हजारों-लाखों प्रवासी श्रमिकों को घर-गाँव वापसी के लिए किया मजबूर। यातायात का साधन नहीं, इसलिए हजारों किलोमीटर दूर अपने घर-गाँव पैदल चले प्रवासी श्रमिक मजदूर।
सम्बंधित कुछ पंक्तियाँ -
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1.
श्रम की महत्ता
जीवन में श्रम जरूरी,
श्रम के बिना कुछ भी नहीं !
हर दिन होता बहुत श्रम,
किसान खेतों में,
मजदूर कल-कारखानों में,
हर जगह दिखता है श्रम !
बिना श्रम कर्म नहीं,
जीवन का सुख श्रम से,
जीवन में श्रम जरूरी,
श्रम के बिना कुछ भी नहीं !
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2.
परेशान प्रवासी श्रमिक
अचानक आया बेरोजगारी का संकट,
रहने और खाने की किल्लत,
अनहोनी की आशंका,
इन सबने किया -
घर-गाँव वापसी के लिए मजबूर,
नहीं यातायात का कोई साधन,
पैदल ही चले प्रवासी श्रमिक-मजदूर।
तालाबंदी के दौर में,
प्रवासी श्रमिक अधिक परेशान,
रहता अपने घर-गाँव दे दूर,
सभी गए उसे भूल !
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दया के पात्र हैं
दया के पात्र हैं संक्रमण के हैं जो शिकार,
और वे भी जिनके मन में है कोई विकार,
आओ शुद्धि की करें कोशिश, प्रचार-प्रसार,
ताकि ना हों हम किसी दुर्गति के शिकार !
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लॉकडाउन के दौरान
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खुद की कैद में रहते
मैंने सुना
चिड़ियों का चहकना,
कबूतरों की गुटर गूं !
खुद की कैद में रहते
मैंने देखा
पक्षियों का फुदकना, उन्मुक्त उड़ना,
फूलों का खिलना,
मोरों का नाचना,
नील गायों का सरपट दौड़ना !
खुद की कैद में रहते
मैंने महसूस किया
हवा में ताजगी,
वातावरण में शांति,
अपने में स्फूर्ति !
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- केशव राम सिंघल

केशव राम सिंघल - एक बहुमुखी व्यक्तित्व, जो मानवता के लिए काम करता है, विभिन्न क्षेत्रों जैसे गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली, क्यूएमएस ऑडिट, प्रकाशन, संपादन, प्रशिक्षण आदि में ज्ञान और बैंकिंग में लगभग पच्चीस वर्षों का अनुभव। एक तेजी से सीखने वाला, नई और उभरती अवधारणाओं के लिए हमेशा तत्पर रहता है, जिम्मेदारियों को संभालने की क्षमता और योग्यता रखता है। अपने व्यक्तिगत प्रयासों से समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव लाने के लिए विभिन्न सामाजिक और व्यावसायिक संगठनों के साथ जुड़ा हुआ है। एक आशावादी, सामाजिक और निवर्तमान व्यक्ति, अच्छा श्रोता और समर्पित कार्यकर्ता। इस ब्लॉग का प्रवर्तक।
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