शपथ
कैसी ये कोरोना महामारी।
करता जग यह त्राहि-त्राहि।।
आया विश्व पे संकट भारी।
भोग रही दुनिया यह सारी।।
धोलो हाथ सब बारी-बारी।
मुखौटा बना है लाचारी।।
रहो निलय, न खोलो किवाड़ी ।
जिनको अपनी जान है प्यारी।।
कैसी होली, अब कैसी दिवाली।
जलाओ दीप, बजाओ थाली।।
नीति पे हो रही जनता भारी।
कैसी ये जमात, सल्तनत क्यूँ हारी?
इस समर बीच खड़ी मैं नारी।
सोच रही अब किसकी बारी।।
हुआ अंधेरा अब विपदा भारी।
काहे पथ भूले 'गिरधारी।।
करो नाश बजाओ रणभेरी।
दे रहे 'शपथ' अब कर ना देरी।।
- गार्गी शर्मा

गार्गी शर्मा - जन्मतिथि 24-6-1981, शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), बी.एड., पूर्व में संत जोसेफ सीनियर सेकेंडरी स्कूल परबतपुरा और आदर्श विद्या निकेतन में हिंदी अध्यापिका। निवास - अजमेर। समय समय पर हिंदी व गुजराती मंत कविताओं और लघुकथाओं की रचना। अपनी रचनाओं के माध्यम से भावाभिव्यक्ति के लिए हमेशा प्रयत्नशील एक गृहिणी।
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